Harichand Thakur Biography – हरिचंद ठाकुर

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हरिचंद ठाकुर
हरिचंद ठाकुर

हरिचंद ठाकुर

हरिचंद ठाकुर

हरिचंद ठाकुर का जन्म 1872 में गोपालगंज के सफलडांगा, जिलाफरीदपुर जो वर्तमान में बांगलादेश में है, हुआ था। उनका जन्म बंगाल के “नमो शूद्र्र्राय” कहे जाने वाले समुदाय में हुआ था। इस समुदाय के लोगों को “चाण्डाल” भी कहा जाता था। बंगाल में चाण्डालों की दशा अत्यन्त दयनीय थी। चाण्डालों के लिए यह अंधकार युग था।

चाण्डालों का हर क्षेत्र में शोषण था। उनको अपमानित किया जाता था। जो लोग इस शोषण और अपमान का विरोध करते थे उन्हें जमींदारों द्वारा जेल में डाल दिया जाता था। हरीचन्द ठाकुर ने बचपन से ही बंगाल के अस्पृश्य समुदाय के लोगों के उत्थान के लिए “आत्मचिन्तन” का पालन करने के लिए धर्म का रास्ता चुना। मनुस्मृति के अनुसार चाण्डाल की उत्पत्ति का कारण शूद्र पिता और ब्राह्मण माता से है।ऐसा माना जाता है कि यह नस्ल पाल वंश के बुध्दिस्ट राजाओं के उत्तराधिकारियों के वंशज हैं। इन्हें बाद में शूद्र और अछूत घोषित कर दिया गया। इनमें से बहुत से लोगों ने बाद में मुस्लिम धर्म स्वीकार कर लिया। चाण्डाल हिन्दुओं से अलग एक स्वतंत्र जाति थी। हरिचंद ठाकुर के समय में चाण्डाल जाति के लोग ब्हुत समृद्व थे। उनमें आपस में किसी तरह का जाति भेद नहीं था।

ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों द्वारा उनके स्कूल, कालेज, विद्यालयों एवं उनकी सम्पत्ति पर कब्जा कर लेने के कारण वे हर क्षेत्र में पिछड़ने लगे। उनके साथ ब्राह्मणों द्धारा द्वारा छुआछूत का व्यवहार किया जाने लगा। अधिकतर चाण्डाल नदियों एवं समुद्र्र के किनारे रहते थे। उनका व्यवसाय मछली पालन, षि एवं नाव चलाना था। उन्हें “माझी और मल्लाह” के नाम से भी पुकारा जाता था। हरीचन्द ठाकुर ने चाण्डालों की मुक्ति के प्रयास किये।

उन्होने महसूस किया कि चाण्डालों की दुर्दशा का कारण अशिक्षा है। हरिचंद ठाकुर ने अशिक्षा, मूढ़ता, अज्ञानता को समाप्त करने के लिए एक नयी धार्मिक संस्था-“मुतुआ संघ” की स्थापना की। उन्होने कहा-“सब लोग शिक्षित बने, कठिन परिश्रम करें, धन कमायें तथा सरकारी नौकरियां प्र्राप्त करें”। उनका संदेश-
धनहीन विद्याहीन जारा ए भवे,
राजनीति क्षेत्रे तारा शान्ति नाही पाबे,
अन्ततां अग्र्रभोगि प्रयोजन ताई,
विद्या चाई, धन चाई, राज कार्य चाई।
हरिचंद ठाकुर के अनुसार शिक्षा के साथ आर्थिक समृद्धि किसी भी समाज के उत्थान का प्रथम चरण है। गुलामी का जीवन जी रहे लोग जब संगठित होंगे और शिक्षित होंगे तो वे राजनैतिक शक्ति प्राप्त कर अपनी दासता का अन्त कर सकते हैं।

उन्होने घोषणा की-“कोई भी जाति बिना संगठन के बलरहित होती है। जिस जाति का कोई राजा नहीं है, वह मृत समान है”।
“जे जातिर दल नाई, से जातिर बल नाई,
जे जातिर राज नाई, से जाति ताजा नाई”।
हरिचंद ठाकुर ने चाण्डाल जाति के सम्मान और उत्थान के लिए संघर्ष किया। वे सामाजिक परिवर्तन के संघर्ष के प्रवर्तक थे। बाबासाहेब ने हरीचन्द ठाकुर के सिधान्तों एवं विचारों को अपने आन्दोलन में सम्मिलित किया। हरिचंद ठाकुर ने अपने अनुयायियों को जाति मानने से मना किया। उन्होंने सभी से मुतुआ संघ में सम्मिलित होने का आह्वान किया। उन्होने स्पष्ट शब्दों में कहा- “ब्राह्मण और वैष्णव सभी स्वार्थी लालची और भ्रष्ट हैं। मुतुआ संघ के लोग निःस्वार्थ और ईमानदार हैं। उन्होंने ब्राह्मणों द्वारा फैलाये गये आडम्बर और अंधविश्वासों का विरोध किया। उनका प्रचार था- “होते काम, मुखे नाम” अर्थात हाथों मे काम, होठों में प्रार्थना। उन्होने सबको कहा अपनी मदद स्वयं करो। आज भी बांगलादेश और पूर्वी बंगाल में मुतुआ धर्म के मानने वाले लोग काफी संख्या में हैं। हरिचंद ठाकुर का आन्दोलन और उनके उपदेश आज भी बहुजन समाज के लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं। उनका संदेश आज भी सामाजिक परिवर्तन का सूत्र है-“जातिभेद का कभी पालन न करें और न ही जातिव्यवस्था का समर्थन करें”।

राजा राम वर्मा

राजा राम वर्मा

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