Biography Of Motiravan Kangali – मोतीरावण कंगाली

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मोतीरावण कंगाली
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मोतीरावण कंगाली

 

बहुजन समाज में जन्मे लोगों की जब-जब बात होती है तब-तब आदिवासी समाज की भूमिका बेहद अहम होती है। आदिवासी समाज इस देश का मूल निवासी है और इसकी जड़ें , यहां की सभ्यता और जुड़ाव काफी पुराना है। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के नागपुर जिले में 2 फरवरी 1949 को आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले छती राम व रायतार के परिवार में ‘‘मोतीराम कंगाली‘‘ का जन्म हुआ था। डॉ कंगाली की प्राथमिक शिक्षा उसी क्षेत्र के कारवाही में हुई और संत टुकड़ो जी विश्वविद्यालय, नागपुर से स्नातक व स्नातकोत्तर की पढ़ाई सामाजिक विज्ञान, भाषा विज्ञान और अर्थ विज्ञान विषयों से पूरी की। मोतीराम कंगाली को डॉक्टरेट की उपाधि ‘‘द फिजियोलॉजिकल बेस ऑफ ट्राइबल, कल्चरल वैल्यूज इन रैस्पेक्ट आफ गोंड ट्राइब आफ सेंट्रल इंडिया ‘‘ विषय में शोध करने पर मिली। बाद में इसे लिपिबद्ध किया गया। मूल निवासियों के खून में जुनून और विद्वानता पाई जाती है। यह बात डॉक्टर मोतीराम कंगाली ने साबित कर दिखाई थी। इस विद्वान महापुरुष ने मूलनिवासी राजा रावण के कार्यों, प्रयोजनों और आदर्शों से प्रभावित होकर अपने नाम से राम शब्द हटा कर एक क्रांतिकारी फैसला लेते हुए मोतीराम कंगाली से मोतीरावण कंगाली रख लिया। इससे परिवार, मित्रों, समाज में तीखी प्रतिक्रिया हुई और मूल निवासियों और आदिवासियों के जुनून की अवधारणा को बल मिला। आदीवासी समाज के जाने-माने विद्वान मोतीरावण कंगाली का कार्यक्षेत्र मध्य भारत के महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मुख्यतः रहा। उन्होंने अपने समाज के लिए, अपने अध्ययन और ज्ञान के माध्यम से भाषा, लिपि, रहन-सहन, रीति-रिवाज, आस्था, उत्सव, खानपान और व्यवस्था परिवेश व मूल्यों को रेखांकित किया व अपने समाज के अलावा समूचे जगत के धमर्, दर्शन, इतिहास और विज्ञान के क्षेत्र में अपने अध्ययन व कौशल से ज्ञान के नए आयाम को स्थापित किया। आजादी के बाद के नए भारत में आदिवासी समाज के एक विद्वान ने अपना स्थान बनाया और बदले में, अपने ज्ञान के हुनर से हड़प्पा कालीन दस्तावेजों को गोंडी भाषा में पढ़ दिया। जहां तमाम इतिहासकारों ने भरसक प्रयासों के पश्चात् हड़प्पा संस्कृति को पढ़ने में और समझने में असफल थे वहां इस मूलनिवासी आदिवासी समाज के गोंडवाना पुत्र ने आदिवासियों की भाषा गोंडी में पढ़कर अपना परचम स्थापित कर दिया और बताया की यहाँ पहले क्षेत्रीय भाषाएँ प्रचलन में थी, भाषा विज्ञान उनका प्रमुख विषय रहा।

इससे उनकी कई भारतीय भाषाओं पर पकड़ बड़ी समृद्ध थी। बैंक की सेवा से सेवानिवृत्त होकर उन्होंने लेखन कार्य किया ताकि अपने समाज को पे बैक टू सोसाइटी कर गोंडवाना आदिवासी समाज के जीवन स्तर को बेहतर किया जा सके। गोंडवाना का इतिहास, गोंडवाना की संस्कृति, गोंडवाना दर्शन, गोंडी भाषा व्याकरण, गोंडी नृत्य, गोंडी शब्दकोश, गोंडी भाषा में देवताओं और महाराज रावण के भजन आदि में अपने लेखन से उत्कृष्ट कार्य किए। उन्होंने सैधवी लिपि जो की हड़प्पा और मोहेंजोदड़ो की खुदाई में मिली उसे गोंडी भाषा में रूपांतरित कर सुगमता से पढ़ा और बड़े ठोस आधार पर कहा कि सिंधु घाटी सभ्यता की भाषा पूर्व द्रविड़ियन भाषा थी। साल 2002 में उन्होंने सैंधवी लिपी से अनुदित कर गोंडी भाषा में पुस्तक भी लिखी। इस किताब को काफी महत्वपूर्ण रचना माना जाता है। डॉक्टर मोतीरावण कंगाली के तमाम दावों के आधार बेहद तार्किक थे। उन्होंने साधारणतया समझाया कि हड़प्पा लिपि दाएं से बाएं लिखी जाती है और गोंड समाज भी अपने सभी कार्य दाएं से बाएं ही करते हैं, जैसे-जैसे डॉक्टर कंगाली इस लिपि को पढ़ने में कामयाब हुए वैसे वैसे हड़प्पा कालीन सभ्यता से रहस्यमयी पर्दा हटता रहा। वे कई भारतीय भाषाओं के ज्ञाता थे। उन्हें हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, गोंडी और मध्य भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में बोली जाने वाली बोलियों व आदिवासी बोली और भाषाओं में अच्छी पकड़ थी। उनके लिखे लेख, पुस्तकें, मुख्यतः व्याकरण व शब्दकोश गोंडी भाषा मे दो भागो में लिखे गए। उन्होंने मराठी-गोंडी, हिंदी-गोंडी, शब्दकोश भी तैयार किया। मोतीरावण कंगाली ने गोंड समाज की पहचान, संस्कृति, संपूर्ण, संस्कार, उत्सव, आस्था, गीत, कुल और ग्राम देवी देवता, देशी इलाज आदि को अपने समुदाय और अन्य लोगों को भी अपनी आदिवासी समृद्ध परंपरा से परिचित कराया। डॉक्टर मोतीरावण कंगाली पाखंडवाद के खिलाफ रहे इसलिए उन्होंने अपने नाम में से राम हटाकर रावण रख लिया। अध्यनरत रहते उन्होंने पाया कि कैसे आदिवासी परंपरा और संस्कृति को हिंदूवाद की आग में झोंका जा रहा है। अनेक परंपरागत पूजा स्थलों को अनेक हिंदू देवी-देवताओं का बताकर रूपांतरण व मेला लगाकर बाजारीकरण करने की प्रथाएं जन्म ले रही हैं, ऐसे बदलाव के प्रति उन्होंने अपने समाज को आगाज करके बताया कि आदिवासियों के मूल्यों का संरक्षण बेहद आवश्यक है इसलिए परम्पराएं जीवित रहनी चाहिए। बताया जाता है कि डंकनी, शंखनी व दंतेश्वरी कुल देवी थी लेकिन बाद में ये हिंदू देवी में तब्दील हो गई। हिंदूवाद व मनुवाद की उन्होंने प्रमुखता से खिलाफत की ओर गोंड समाज को जागरूक कर अपनी पहचान बनाने की ओर अग्रसर किया। उनकी लिखित सम्प्रति पारी कुपार, लिंगो गोंडी, पुनेम दर्शन एक अनमोल कृति है।

उन्होने महसूस किया अभी भी इस समाज का दोहन और शोषण जारी है। आदिवासी समाज की पहचान, परंपरा और संस्कृति विलुप्त ना हो इसके लिए वे अपनी लेखनी विद्वता से रोशनी कर अपने समाज को जागृत करते रहे। 30 अक्टूबर 2015 को विदर्भ क्षेत्र के नागपुर में उनका परिनिर्वाण हो गया और भारत ने इस महान विद्वान को खो दिया लेकिन उनके विचार और संघर्ष आज भी हमारे बीच जिंदा है।

एस पी सिंह

 एस पी सिंह

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